| أنا أمضيه في الفراش عليلا | غاض ماء الحياة إلا قليلا | |
| وبخرج طغى فأضحى سيولا | في معاش ضنك بدخل طفيف | |
| هيكلا مقعدا وطرفا كليلا | هد جسمي الضنى فلم يبق إلا | |
| كان حظي فيها ضعيفا هزيلا | هان شأني لما سلكت سبيلا | |
| أحسب الجم من نضالي قليلا | كنت أعنى فيها بنشء بلادي | |
| واستحب الصحاب عني الرحيلا | إن رماني دهري فحطم جهدي | |
| ـز بنفسي ما كنت يوما ذليلا | فأنا من بعون ربى ذو عـ |